राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूरे साल में छह उत्सवों का आयोजन करता है-
1. विजयादशमी उत्सव
2. मकर संक्रांति उत्सव
3. वर्ष प्रतिपदा उत्सव
4. हिंदू साम्राज्य दिनोत्सव
5. गुरु पूर्णिमा उत्सव
6. रक्षाबंधन उत्सव
संघ ने इन छह महोत्सवों को क्यों चुना? इस दर्शन के पीछे के उद्देश्य के बारे में विस्तार से 'संघ उत्सव' में बताया गया है। 'संघ उत्सव' में द्वितीय संघ प्रमुख मा.स. गोलवलकर और तृतीय सरसंघचालक बाला साहेबदेवरस की टिप्पणियाँ तथा विचारों को समाहित किया गया है-
“संघ ने इन उत्सवों को इनके नाम और उद्देश्यों से जोड़ने के लिए इन्हें चुना। लोगों को समझना चाहिए कि संघ ने अपनी तरफ से किसी नए त्योहार का सृजन नहीं किया है; लेकिन ये त्योहार राष्ट्रीय महत्त्व के हैं और हिंदू समाज आदिकाल से इनको आयोजित करता आ रहा है।"
संघ के छह राष्ट्रीय उत्सव: विजयादशमी से गुरु पूर्णिमा तक का संपूर्ण दर्शन
1. विजयादशमी शस्त्र पूजन (Vijayadashami Shastra Pujan)
विजयादशमी उत्सव हालाँकि स्वयंसेवकों के लिए सारे उत्सव समाज महत्ता के हैं, परंतु इस महोत्सव का संघ के हृदय से नाता है; क्योंकि संघ का गठन विजयादशमी (27 सितंबर, 1925) के दिन ही किया गया था। हर साल विजयादशमी अलग-अलग दिनों पर पड़ती है, जैसा कि हिंदू कलेंडर दरशाता है। विजयादशमी का त्योहार देश के हर हिस्से में आयोजित किया जाता है और इसके बारे में तमाम कहानियाँ, किंवदंतियाँ प्रचलित हैं; लेकिन सबसे प्रचलित और लोकप्रिय कथा श्रीराम द्वारा रावण के वध को लेकर है, जो कि भारत में सर्वाधिक पूजनीय देव हैं। महाभारत ग्रंथ के अनुसार, पांडवों का 13 साल का वनवास इसी दिन खत्म हुआ था और इसके उपरांत ही उन्हें अपने शस्त्रास्त्रों की पूजा करने की अनुमति मिली थी। हिंदी पट्टी में इस समारोह को शस्त्र-पूजन के रूप में जाना जाता है। संघ स्वयंसेवक इस दिन सांकेतिक रूप से शस्त्र-पूजन समारोह आयोजित करते हैं। ऐसा स्वयंसेवकों के भीतर बहादुरी और साहस के गुणों का संचार हो, इसलिए किया जाता है। यह त्योहार भारत की ऐतिहासिक व सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा हुआ है और इसके संबंध में तमाम प्राचीन कहानियाँ, किंवदंतियाँ आदि प्रचलित हैं। इन सब में हालाँकि एक संदेश है, जो सब में समान है - बुराई पर अच्छाई की जीत। संघ में एक परंपरा रही है कि इस दिन नागपुर में सरसंघचालक जनसभा को संबोधित करते हैं, जिसमें हजारों की संख्या में स्वयंसेवक उपस्थित रहते हैं।
2. मकर संक्रांति संघ उत्सव (Makar Sankranti Utsav)
मकर संक्रांति महोत्सव इसे मकर संक्रांति के रूप में भी जाना जाता है। यह हिंदुओं का सबसे महत्त्वपूर्ण पर्व है और इसे माघ (जनवरी) के महीने में मनाया जाता है। इस दौरान सूर्य का कोण उत्तर की ओर अधिक हो जाता है। इस पर्व का आयोजन सूर्य के पृथ्वी के उत्तरी भूभाग (मकर राशि) के सफर की शुरुआत के तौर पर किया जाता है। संघ के आयोजन के तमाम और मायने भी होते हैं। यह वह समय होता है, जब माना जाता है कि सफर अंधकार से प्रकाश की ओर, झूठ से सच की ओर और मृत्यु से जीवन की ओर शुरू होता है। भारतीय इस दिन नदियों में पवित्र स्नान करते हैं। ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो यह त्योहार तमाम महत्त्वपूर्ण घटनाओं का साक्षी भी रहा है। संघ की दैनिक शाखा के उपरांत तिल और गुड़ मिलाकर स्वयंसेवकों में वितरित किया जाता है। वरिष्ठ संघ कार्यकर्ता शाखाओं पर स्वयंसेवकों को इस पुरातन त्योहार की समाज के लिए महत्ता बताते हैं। समय-समय पर तमाम शाखाएँ मिलकर इसका आयोजन करती हैं। यही वह समय होता है, जब हर स्वयंसेवक को सोचना होता है कि देश के लिए उसका निजी तौर पर क्या योगदान रहा है। इस अवसर पर एक नई शुरुआत भी करनी होती है और स्वयंसेवकों को यह प्रण करना होता है कि वे निस्स्वार्थ भाव से समाज के उत्थान और कल्याण के लिए कार्य करते रहेंगे। संघ प्रकाशन की 'संघ उत्सव' पत्रिका में संगठन के लिए इस पर्व की महत्ता के विषय में काफी विस्तार से समझाया गया है।
3. वर्ष प्रतिपदा और डॉ हेडगेवार जयंती (Varsha Pratipada )
वर्ष प्रतिपदा महोत्सव संघ इसे 'हिंदू नव वर्ष' के रूप में भी मनाता है। पारंपरिक भारतीय ज्ञान और पुराणों के अनुसार, भगवान् ब्रह्मा ने इसी दिन ब्रह्मांड की रचना शुरू की थी। इस दिन के साथ भी तमाम प्रकार की घटनाएँ जुड़ी हुई हैं। सम्राट् विक्रमादित्य ने इस दिन शक आक्रांताओं को हराया था और उन्हें भारत से भागने पर मजबूर किया था। इसलिए नव हिंदू संवत्, जिसे 'विक्रम संवत्' भी कहा जाता है, की शुरुआत इस दिन से हुई थी। यह कलेंडर देश के तमाम हिस्सों में प्रमुखता से माना जाता है, खासकर ग्रामीण हिस्सों में। अयोध्या के राजा श्रीराम का राजतिलक भी इसी दिन हुआ था। देश के महानतम आधुनिक समाज-सुधारकों में से एक महर्षि दयानंद ने आज ही के दिन 'आर्यसमाज' की स्थापना की थी। भारत का आधिकारिक कलेंडर 'शक संवत्' भी इसी दिन से शुरू होता है। संयोगवश संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार का जन्म भी इसी दिन हुआ था।*
'संघ उत्सव' के अनुसार, 'यह त्योहार बीते वर्ष के समापन और नए वर्ष के शुभारंभ का समय होता है, इसलिए बीते वर्ष के क्रियाकलापों की समीक्षा और अगले वर्ष के लक्ष्यों व योजनाओं को तैयार करनेका भी अवसर होता है।' इस दिन स्वयंसेवक संघ की पूरी पोशाक (संपूर्ण गणवेश-काली टोपी, सफेद शर्ट, खाकी निकर, काले जूते व खाकी जुराब तथा दंड) धारण करते हैं और भगवा ध्वज फहराने से पूर्व संघ के संस्थापक को विशेष सलामी देते हैं। इस सलामी को 'आद्य सरसंघचालक प्रणाम' कहते हैं। संघ का बैंड, जिसे 'घोष' कहते हैं, हर संभव जगह पर बजाया जाता है। मुख्य संघ कार्यकर्ता इस दिन बौद्धिक विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इस समय समाज के किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्तित्व को मुख्य अतिथि के रूप में भी आमंत्रित किया जाता है।
4. हिंदू साम्राज्य दिवस छत्रपति शिवाजी महाराज (Hindu Samrajya Diwas Shivaji)
हिंदू साम्राज्य दिवस संघ द्वारा आयोजित तमाम महोत्सवों में से यह उत्सव अलग प्रकार का होता है। जबकि संघ द्वारा मनाए जानेवाले अन्य महोत्सव समाज द्वारा भी मनाए जाते हैं। यह एकमात्र महोत्सव है, जिसमें समाज की सहभागिता नगण्य होती है। 'वास्तव में, लोगों को इसकी ऐतिहासिक महत्ता के विषय में पता ही नहीं है कि इस दिन ऐसी ऐतिहासिक घटना हुई थी कि उसे सम्मान दिया जाना ही चाहिए।' (संघ उत्सव) यह पर्व मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी के सिंहासनारूढ़ की याद में मनाया जाता है। यह सिंहासनारोहण 19 मई, 1674 को हुआ था। इस के साथ देश में हिंदू साम्राज्य की आधिकारिक स्थापना हुई थी और शिवाजी ने खुद इस दिन घोषणा की थी,“हिंदू स्व-शासन स्थापित किया जाना चाहिए, ईश्वर की यही इच्छा है। "उन्होंने यह भी कहा था, “यह राज्य शिवाजी का नहीं है, बल्कि धर्म का है।"
इस ऐतिहासिक घटना ने पूरे देश के हिंदुओं की चेतना में बिजली दौड़ा दी थी। यह वह समय था, जब हिंदू सोच भी नहीं सकते थे कि वे शासन भी कर सकते हैं। हिंदुओं का आत्मविश्वास इतना नीचे चला गया था कि उन्होंने यह स्वीकार कर लिया था कि केवल मुसलिम ही शासन कर सकते हैं और हिंदू मात्र उनके सेवक बनकर ही रह सकते हैं। ऐसी चिंताजनक हालत में शिवाजी द्वारा साम्राज्य खड़ा करने से हिंदुओं में आत्मसम्मान की भावना जागी। इसलिए अगर हमें अपने पथ पर उचित तरीके से आगे बढ़ना है तो यह जरूरी है कि उस महान् हिंदूसम्राट् शिवाजी को हम याद रखें, जिन्होंने इतिहास रचा था। यह पर्व संघ शाखा पर आयोजित किया जाता है, जहाँ शिवाजी और उनके गुरु समर्थ रामदास की पूजा की जाती है। इस अवसर पर राजपूत राजा जयसिंह को लिखी शिवाजी की चिट्ठी भी जरूर पढ़ी जाती है। इस चिट्ठी में राजपूत योद्धाओं से अपील की गई थी कि वे मुगलों के लिए हिंदुओं का रक्त न बहाएँ और उन्हें छोड़कर शिवाजी का साथ पकड़ें, ताकि महान् उद्देश्य पूरा किया जा सके। इस अवसर पर शिवाजी की वीर गाथाओं से जुड़ी तमाम कहानियाँ भी वरिष्ठ संघ कार्यकर्ताओं द्वारा बौद्धिक चर्चा के दौरान स्वयंसेवकों को सुनाई जाती हैं। समय-समय पर एक साथ मिलकर इस पर्व को आयोजित करते हैं। शिवाजी और समर्थ गुरु रामदास को श्रद्धांजलि अर्पित की जाती है। शिवाजी की माताजी और उनके सहयोगी तानाजी की भूमिका को भी काफी विस्तार से सबके समक्ष रखा जाता है। शिवाजी के साथ उनकी माता जीजाबाई को भी संघ परिवार में बड़ा सम्मान दिया जाता है। जीजाबाई ने ही शिवाजी को प्रेरित कर मुगलों से संघर्ष करके धर्म का राज स्थापित करने, जिसे 'सच्चाई का शासन' भी कहा जा सकता है, का मार्ग प्रशस्त किया। इन आयोजनों में स्वयंसेवक देशभक्ति के गीत भी गाते हैं, जिनको विशेष तौर पर संघ प्रकाशनों में बहुत से लेखकों ने लिख रखा है।
5. गुरु पूर्णिमा उत्सव ( Guru Purnima)
गुरु पूर्णिमा महोत्सव हिंदू परंपरा में गुरु का स्थान ईश्वर से भी उच्च माना जाता है। यह महोत्सव एक अवसर प्रदान करता है कि जीवन में सही दिशा दिखाने और ज्ञान का भंडार भरने के बदले हम सब अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान प्रदर्शित कर सकें। संघ में, जैसा कि इस पुस्तक में पहले ही बताया जा चुका है, भगवा ध्वज ही गुरु है। इसलिए स्वयंसेवक इस दिन भगवा ध्वज की पूजा करते हैं। यह पर्व आषाढ महीने या पूर्णमासी के दिन आयोजित किया जाता है। इस दिन को 'आषाढी पूर्णिमा' के नाम से भी जाना जाता है। स्वयंसेवक इस दिन सफेद कपड़े (प्रमुख तौर पर धोती-कुर्ता या कुर्ता-पाजामा) और संघ की काले रंग की टोपी पहनते हैं तथा भगवा ध्वज को पुष्प अर्पित करते हुए उसकी पूजा करते हैं। इस दौरान बौद्धिक चर्चा भी होती है, जिसमें गुरु की महत्ता बताई जाती है और स्वयंसेवकों को यह याद दिलाया जाता है कि संघ ने किसी व्यक्ति के बजाय भगवा ध्वज को ही गुरु क्यों चुना। इस पर्व के जरिए जो संदेश दिया जाता है, भले ही वह बहुत बारीक हो, लेकिन वह काफी उद्देश्यपूर्ण होता है। संदेश के अनुसार, विचारधारा किसी भी व्यक्ति से बड़ी है और संघ कोई व्यक्ति-केंद्रित संगठन नहीं, बल्कि विचारधारा से प्रेरित संगठन है।
6. रक्षाबंधन
रक्षाबंधन भारत में प्रचलित त्योहारों में यह भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है, जिसे हर समुदाय और धर्म में मनाते हुए देखा जा सकता है। इस दिन बहनें भाइयों की कलाई पर राखी बाँधती हैं और उनसे यह वचन लेती हैं कि वे उनकी रक्षा करेंगे। ऐतिहासिक स्तर पर भी इस त्योहार से जुड़ी ऐसी तमाम घटनाएँ हैं, जिनसे इस त्योहार की महत्ता का पता चलता है। संघ स्वयंसेवक रक्षाबंधन का पर्व मनाते हैं और वे एक-दूसरे की कलाई पर राखी बाँधकर यह वचन लेते और देते हैं कि वे एक-दूसरे की रक्षा करेंगे और आड़े वक्त में उनके साथ खड़े रहेंगे, हालात चाहे जो भी हों। इस प्रकार स्वयंसेवकों में भाईचारे की भावना विकसित और सुदृढ होती जाती है। संघ इस दिन को 'अधिकतम संख्या दिवस' के रूप में भी मनाता है। प्रयास यही होता है कि जो लोग शाखाओं में कभी-कभार गए हों, उन्हें भी उस दिन शाखा पर लाया जाए। इसके अलावा, नए स्वयंसेवकों के लिए भी यह दिन काफी प्रेरणादायी और आत्मविश्वास बढ़ानेवाला होता है। इस प्रकार संघ शाखाओं के पल्लवित और पोषित होने में इस दिन का काफी अहम योगदान होता है।
स्थान, जहाँ शाखाएँ लगाई जाती हैं, इस दिन विशेष तौर पर सजी-धजी शाखाएँ नजर आती हैं और हर शाखा पर स्वयंसेवकों की संख्या सौ पार कर जाती है। इतने सारे लोगों के एक ही अवसर पर तमाम प्रकार के खेलों में हिस्सा लेने, देशभक्ति के गीत गाने और 'भारत माता की जय' के नारे लगाने के दौरान ऐसा माहौल उत्पन्न हो जाता है कि आसपास के क्षेत्र से आए लोग यह सब कौतूहल से देखने लगते हैं। शाखा शुरू होने के बाद पवित्र धागा सबसे पहले भगवा ध्वज को बाँधा जाता है और उसके बाद स्वयंसेवक उस धागे को एक-दूसरे को बाँधते हैं। पिछले कई दशकों से संघ ने इस कार्यक्रम को बेहद दिलचस्प तरीके से बढ़ाया है। एक-दूसरे को धागा बाँधने के बाद ये स्वयंसेवक आसपास की झुग्गी बस्तियों में जाते हैं और वहाँ रहनेवाले गरीबों तथा उनके परिवारों के सदस्यों को राखी बाँधते हैं।


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