कांवड़ यात्रा : आध्यात्म के साथ उभरती वर्तमान चुनौतियाँ :- कांवड़ यात्रा केवल एक पैदल यात्रा या शारीरिक परिश्रम नहीं है, बल्कि यह सनातन धर्म में कायिक (शारीरिक), मानसिक और वाचिक (मन और वाणी) तपस्या का एक अनुपम उदाहरण है। जब एक कांवड़िया कंधे पर कावड़ उठाकर जल लेने निकलता है, तो वह सांसारिक मोह-माया से परे होकर पूर्णतः शिवमय हो जाता है। श्रावण (सावन) मास में आयोजित होने वाली कांवड़ यात्रा भारत की प्राचीनतम और विशालतम लोक-धार्मिक परंपराओं में से एक है। हर वर्ष करोड़ों शिवभक्त (कांवड़िये) हरिद्वार, ऋषिकेश, गंगोत्री, वाराणसी, गोमुख, प्रयागराज आदि पवित्र स्थलों से गंगाजल भरकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने-अपने क्षेत्रों के शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। सामाजिक जुड़ाव का माध्यम:- जहाँ पहले इस यात्रा में मुख्यतः साधु-संत या ढलती उम्र के लोग भाग लेते थे, वहीं आज इसमें 80 प्रतिशत से अधिक युवा वर्ग की भागीदारी है। यात्रा में महिलाएं और बच्चे भी बड़ी संख्या में शामिल हो रहे हैं। विगत कुछ दशकों में यह यात्रा केवल व्यक्तिगत भक्ति या तीर्थाटन तक सीमित न रहकर एक विशाल सामाजिक, सांस्कृतिक जुड...