भारतीय संविधान में मौलिक कर्तव्य: इतिहास, महत्व और नागरिक दायित्व:-
यद्यपि वर्ष 1950 में स्वीकृत हमारे संविधान में कर्तव्यों के विषय में कोई अधिक चर्चा नहीं हुई। किंतु वर्ष 1976 में, जिस समय देश पर आपातकाल लागू था, तत्कालीन कांग्रेस सरकार में कैबिनेट मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया, जिसकी सिफारिश को आधार बनाकर 10 कर्तव्यों वाला 42वां संविधान संशोधन किया गया। बाद में वर्ष 2002 में एक और संशोधन द्वारा 11 वां कर्तव्य भी जोड़ा गया।
यद्यपि कर्तव्यों की पालना कराने की कोई बाध्यता नहीं है, और उन्हें न करने पर किसी प्रकार के दंड का प्रावधान भी नहीं है, किंतु यह अतिआवश्यक है कि सभी नागरिक कुछ आधारभूत कर्तव्यों का पालन अवश्य करें।
नागरिक कर्तव्य और अधिकार: समृद्ध राष्ट्र की नींव (सर्वोत्तम एवं संतुलित):-
नागरिक अधिकार और नागरिक कर्तव्य, यह दोनों ऐसे हैं जैसे मनुष्य के दो पैर। दोनों बराबर चलेंगे तभी मनुष्य आगे चल पाएगा। इसी प्रकार अपना देश, समाज भी आगे तभी बढ़ पाएगा जब हम अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों का भी पूरी तरह ध्यान रखेंगे।
इस समय पर संविधान व कानून द्वारा हमारे नागरिक अधिकारों की रक्षा की जाती है और देश भर में बड़ी संख्या में व्यक्ति, संगठन व समाज समूह बने हुए हैं जो विभिन्न प्रकार से अपने अधिकारो के लिए जागरूक रहते हैं, उनका प्रचार प्रसार करते हैं, यहां तक कि संघर्ष भी करते हैं और अधिकारों की प्राप्ति के लिए सब प्रकार के संवैधानिक प्रक्रिया का उपयोग भी करते हैं।
दुखद यह भी है कि अधिकारों की प्राप्ति के लिए वह अनेक बार अनाधिकार चेष्टा व कार्यों को करने में भी कई बार संकोच नहीं करते।
नागरिक कर्तव्य एवं शिष्टाचार: एक सजग समाज का आधार :-
किसी भी समाज के फलने फूलने की अनिवार्य शर्त है कि वहां के लोग अपने नागरिक कर्तव्यों का न केवल ध्यान रखें, बल्कि उनका समुचित पालन भी करें। भारत में 6 जनवरी को "मूलभूत कर्तव्य दिवस (6 January Maulutik Kartavya Divas)" के रूप में मनाया जाता है।
नागरिक कर्तव्यों की पूर्ति के लिए जन संगठनों, सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक संगठनों, प्रवचन कर्ताओं तथा वक्ताओं को आगे आना चाहिए। क्योंकि संविधान में लिखित मार्गदर्शक / नीति निर्देशक सिद्धांत की तरह नागरिक कर्तव्य भी स्वाभाविक रूप से अदालत के विचारण के योग्य नहीं है।
अधिकार और कर्तव्य: एक ही सिक्के के दो पहलू :-
- 11 मौलिक कर्तव्य :-
1. संविधान का पालन करना और उसके आदर्श और संस्थानों, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गीत का सम्मान करना।
2. स्वतंत्रता संघर्ष के लिए प्रेरित, स्वतंत्रता संघर्ष के उद्दात विचारों को आदर्श मानना और उनका पालन करना।
3. भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता का समर्थन करना, उसे सुरक्षित करना।
4. देश की रक्षा करना और आवश्यकता पड़ने पर राष्ट्रीय सेवा प्रदान करना।
5. भारत के सभी लोगों के बीच सांप्रदायिक भाषण और क्षेत्रीय या विभागीय विविधता को पार करके सामान्य भाईचारे और सद्भाव की भावना को बढ़ावा देना और महिलाओं की मर्यादा के खिलाफ अपमानजनक आचरण का त्याग करना।
6. भारत देश की संयुक्त धरोहर को सम्मान देना और संरक्षित करना।
7. प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित रखना और उसे सुधारना। जैसे कि वन, झील, नदियां और वन्य जीवन का पर्याप्त ध्यान रखना और जीवित प्राणियों के प्रति दया करुणा रखना।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद तथा जिज्ञासा एवं सुधार की भावना का विकास करना।
9. सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा संरक्षा करना और हिंसा का त्याग करना।
10. व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की दिशा में प्रयास करना, ताकि राष्ट्र लगातार प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तर पर पहुंच सके।
11. 6 वर्ष से 14 वर्ष तक के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर प्रदान करना।
(86th Amendment Act 2002 यह 86 वां संवैधानिक संशोधन अधिनियम वर्ष 2002 में जोड़ा गया।)
•विभिन्न सरकारों ने समाज में कर्तव्यबोध जागरण के लिए कुछ संस्थाओं का भी निर्माण भी किया है। जैसे- एनएसएस, नेशनल स्काउट एंड गाइड्स, एनसीसी, नेहरू युवा केंद्र आदि।
•इसी प्रकार देश में अनेक राष्ट्र हितचिंतक स्वयंसेवी संस्थाएं भी कार्यरत हैं, जो नागरिक कर्तव्य का बोध जागरण की दिशा में सक्रियता से कार्यरत हैं। हमें ऐसी संस्थाओं को पूरे मनोयोग से सहयोग करना चाहिए।

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