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Ahilya Bai Holkar story part-3

 पुण्यश्लोका लोकमाता अहल्यादेवी होलकर-3:-

Ahilya Bai Holkar story


पुण्यश्लोका लोकमाता अहल्यादेवी होलकर जीवनवृत्त-1:-

  • 31 मई 1723 को अहमदनगर के चौंडी ग्राम में माता सुशीलापिता माणकोजी शिंदे के घर तीसरी संतान के रूप में अहिल्या का जन्म हुआ। मानकोजी स्वयं अपनी पुत्री अहिल्या को विभिन्न विषयों का प्रशिक्षण देते थे। उन्होंने बालपन में ही उन्हें गणित, भूगोल, घुड़सवारी युद्ध, पत्र व्यवहार इत्यादि विधाओं का ज्ञान देना प्रारंभ कर दिया था। अहिल्या खेल-खेल में कभी मिट्टी के हाथी, घोड़े, किले बनाती तो कभी शिवलिंग।
  • मल्हारराव जी, बाजीराव पेशवा के मित्र भी थे और उनके सैन्य में भी थे। मल्हार राव जी को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया गया था। एक दिन पुणे जाते समय मल्हार राव होलकर चौंडी गांव में विश्राम के लिए रुके। एकाएक उनकी नजर एक बच्ची अहिल्याबाई पर पड़ी, जो एकाग्रचित्त होकर भगवान शिव की आराधना कर रही थीं। दीपक की लौ से उनका मुख आलोकित हो रहा था। "इतनी कम उम्र में उस लड़की की धर्मनिष्ठा को देख मल्हारराव होलकर काफी प्रभावित हुए। उनकी यह सादगी, विनम्रता और भक्ति भाव मल्हार राव होलकर को भा गया।"

पुण्यश्लोका लोकमाता अहिल्यादेवी होलकर-जीवनवृत्त-2:-


  • यह जानते हुए भी कि बालिका अहिल्याबाई किसी राजवंश से नहीं है बल्कि एक चरवाह की बेटी है, मल्हारराव होलकर ने उन्हें अपनी पुत्रवधु बनाने का निश्चय किया। इस प्रकार देवी अहिल्या 12 वर्ष की अवस्था में इंदौर राजघराने की बहू बन गई।
  • मल्हारराव जी और उनकी धर्मपत्नी गौतमाबाईजी, अहिल्या देवी के लिए आदर्श सास-श्वसुर के रूप में दिखाई पड़ते हैं। मल्हारराव जी अहिल्या से अत्यंत स्नेह रखते थे। वास्तव में उन्होंने अहिल्या को अपनी बेटी की तरह स्वीकार किया, उनके व्यक्तित्व को निखारा और उनका पालन पोषण भी किया।
  • उनकी सास गौतमाबाई ने गृह संचालन से लगाकर तोपखाने तक 18 विभागों का प्रशिक्षण अहिल्यादेवी को दिया। गौतमाबाई स्वयं भी युद्ध कला में पारंगत महिला थी। वह भी मल्हारराव जी के साथ युद्ध पर जाया करती थी। व्यवहारिक जीवन मूल्य हो या राजकाज के कार्य हो, मल्हारराव जी और उनकी धर्मपत्नी गौतमाबाई अहिल्या के लिए सास-श्वसुर के साथ साथ गुरू समान भी थे। इसीलिए वे स्वयं को सूबेदारजी की बहू कहलाना पसंद करती थी।

पुण्यश्लोका लोकमाता अहिल्यादेवी होलकर-जीवनवृत्त-3:-


  • मल्हारराव जी को अपने अभियानों के चलते ज्यादातर समय बाहर जाना होता था। ऐसी स्थिति में मात्र 15 वर्ष की आयु से ही देवी अहिल्या राजकाज के काम को समझने लगी थी। वह राजदरबार और कार्यालय दोनों ही संभाल लेती थीं। राजकाज के काम में वह इतनी अनुशासित थीं, कि वह किसी भी अनियमितता को सहन नहीं करती थी।
  • पुत्र मालेराव के यद्यपि अपनी माता अहिल्याबाई से वैचारिक मतभेद रहते थे। किंतु फिर भी, वह मालेराव से अगाध स्नेह करती थी। मालेराव जब गादी पर बैठे थे, तो वस्तुतः शासन का संपूर्ण प्रबंध देवी अहिल्या ही देखा करती थीं।
  • अहिल्या माता ने अपने जीवन में पांच पुरुष और अठारह महिलाओं का निधन देखा था। कुम्भेरी (राजस्थान) की एक युद्ध मुहिम में तोप के गोले से पति खण्डेराव का बलिदान हो गया। अगले दस वर्ष में ही सास गौतमाबाई व ससुर मल्हारराव का देहांत हो गया। अहिल्याबाई की दो संतान थी। पुत्र मालेराव व कन्या मुक्ताबाई। दुर्भाग्यवश बावीस वर्ष की आयु में ही पुत्र मालेराव का निधन हो गया। मालेराव की मृत्यु के बाद अहिल्या माता का हृदय टूट गया और वे अपनी राजधानी को इंदौर से स्थानांतरित करके महेश्वर ले गई।

पुण्यश्लोका लोकमाता अहिल्यादेवी होलकर - जीवनवृत्त-4:-


  • सन् 1790-91 में फैले हैजे में नाती नत्थोबा का निधन हो गया। एक वर्ष बाद ही जवांई यशवंतराव फणसे का निधन होने पर पुत्री मुक्ताबाई ने सति जाने का निर्णय लिया। अहिल्याबाई के बहुत प्रयास के बाद भी वे रुकी नहीं, सति हो गईं। इतनी दुर्घटनाएं किसी भी व्यक्ति को अंदर तक तोड़ देने के लिए पर्याप्त होती हैं। किंतु अहिल्या माता अपने कर्तव्य पथ पर अडिग खड़ी रहीं। अपनी पारिवारिक परिस्थितियों का प्रभाव राज्य के कार्यभार और जन कल्याण पर नहीं पड़ने दिया।
  • महादेव की अनन्य भक्त देवी अहिल्याबाई ने निरंतर 29 वर्ष अपने राज्य का संचालन व लोककल्याण के कार्य करते हुए 13 अगस्त 1795 को अंतिम श्वास ली। महेश्वर के नर्मदा तट पर छत्री के रूप में आपका स्मारक निर्मित है।

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