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नागरिक कर्तव्य एवं शिष्टाचार (Civic duties and etiquette)

 नागरिक कर्तव्य एवं शिष्टाचार :-

 घर में शिष्टाचार-1:-

घर वह स्थान है, जहाँ से बच्चा प्रथम शिष्टाचार सीखता है; क्योंकि माँ ही बच्चे की प्रथम गुरु होती है, तत्पश्चात् बच्चा स्कूल आदि से शिष्टाचार प्राप्त करता है।


घर में जैसा माता पिता, चाचा चाची या अन्य बड़ों का आपसी संवाद और व्यवहार होता है, बाल मन पर उसका निश्चित प्रभाव पड़ता है। बालक जैसा देखता है, वैसा ही सीखता है। इसलिए परिवार में आग्रहपूर्वक सभी बड़े संयमित व मर्यादित संवाद व व्यवहार करें।


घर से ही शिष्टाचार की नींव सुदृढ़ होती है, क्योंकि घर का माहौल, रहन-सहन, बातचीत का ढंग, मेल-मिलाप आदि शिष्टाचार का वह प्रथम अध्याय है, जो किसी को भी सामाजिक प्राणी बनाता है।

 घर में शिष्टाचार-2:-

घर में कोई सदस्य- चाहे छोटा हो अथवा बड़ा-सभी को एक-दूसरे के प्रति उचित शिष्टाचार अपनाना पड़ता है, तभी घर एक खुशहाल परिवार अथवा 'स्वीट होम' कहलाता है। जिस घर में लोगों में एक-दूसरे के प्रति शिष्टाचार की भावना नहीं है अथवा वे एक-दूसरे के प्रति उचित शिष्टाचार नहीं अपनाते हैं वह घर घर नहीं, अपितु पशुओं के रहने के स्थान समान होता है, जहाँ पाशविक प्रवृत्ति वश एक दूसरे को देखकर गुर्राते हैं और सिर-फोड़ लड़ाई करते रहते हैं।

यदि किसी घर में शिष्टाचार है तो सब ठीक है। परिवार के सभी सदस्य शांति से रहेंगे और दूसरों को भी शांति से जीने देंगे, अन्यथा स्वयं की शांति तो भंग करेंगे ही, और आस-पड़ोस को भी चैन से नहीं जीने देंगे।

 घर में शिष्टाचार-3:-

   घर में माता-पिता, भाई-बहन के अतिरिक्त अन्य रिश्ते-नातेदार होते हैं, उन सभी के प्रति यथोचित शिष्टाचार हमारा कर्तव्य होता है। क्योंकि परिवार के प्रति उचित शिष्टाचार नहीं अपनाएँगे तो समाज के अन्य लोगों के प्रति क्या शिष्टाचार अपनाएँगे। इसलिए शिष्टाचार की भावना और शिष्टाचारपूर्ण व्यवहार अलग- अलग बातें हैं।

  शिष्टाचार की भावना मात्र होने से सबकुछ नहीं होता, उस भावना का सहज प्रकटीकरण भी होना चाहिए। शिष्टाचार हो और मन में कुछ और भावना हो तो ऐसा शिष्टाचार किस काम का! अच्छे विचार और भावना के साथ दूसरों का सम्मान करना ही उचित शिष्टाचार है।

 घर में शिष्टाचार-4:-

 माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

माता-पिता की सेवा साक्षात् भगवान् की सेवा है। जो व्यक्ति माता-पिता की सेवा नहीं करता अथवा उनकी अवज्ञा करता है, वह पशु के समान है। प्राचीनकाल से आज तक माता-पिता की अनन्य सेवा के अनेक अनुपम उदाहरण मिलते हैं।

 • भगवान् श्रीराम पिता की आज्ञा स्वीकार कर चौदह वर्ष वन में रहे। 

• पितृभक्त नचिकेता ने अपने पिता के आदेश पर स्वयं को यम के हवाले कर दिया।

• श्रवणकुमार ने अपने नेत्रहीन माता-पिता को काँवड़ में बैठाकर तीर्थयात्रा करवाई। 

ऐसे अनेक उदाहरण हैं। अतएव माता-पिता के प्रति इस तरह का शिष्टाचार होना चाहिए, जो हमारे देश की संस्कृति और परंपरानुसार उचित हो।

 घर में शिष्टाचार-5:-

 माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• प्रातः अपने माता-पिता के चरण- स्पर्श कर प्रणाम करना चाहिए, क्योंकि उन्हीं के कारण हमारा अस्तित्व है और उन्हीं के कारण हम पहचाने जाते हैं।

• माता-पिता की आज्ञा का सदैव पालन करना चाहिए। उनकी बात का अनादर अथवा अवज्ञा करना सबसे बुरा कार्य है।

• माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। उनकी जरूरतों को पूर्ण करना चाहिए।

• माता-पिता को कभी कष्ट नहीं देना चाहिए।

• माता-पिता के किसी भी कार्य को करने में कभी शर्म नहीं करनी चाहिए।

 घर में शिष्टाचार-6:-

माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• अपने कार्य स्वयं करने चाहिए। माता-पिता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए और न ही उन्हें अपने कार्य करने को कहना चाहिए- अर्थात् कपड़े धोना, नहाना आदि निजि कार्य स्वयं करना चाहिए।

• विद्यार्थियों को भी घर में अपने कार्य स्वयं करना चाहिए। स्कूल काॅलेज आदि से वापसी पर अपना सामान उचित स्थान पर रखना चाहिए, न कि इधर-उधर अस्त-व्यस्त रखकर माता-पिता को परेशान करना चाहिए।

• माता-पिता की आज्ञा के बिना घर से बाहर नहीं जाना चाहिए। उन्हें बताकर जाएँ-कहाँ जाना है और कब तक आ जाएँगे, ताकि माता - पिता निश्चिंत रहें। यदि बाहर देर हो जाए तो सूचित कर देना चाहिए।

• कोई भी बड़ा निर्णय या नया कार्य प्रारंभ करने से पूर्व माता-पिता की जानकरी में अवश्य लाना चाहिए। उनसे विचार विमर्श कर उनकी आवश्यक स्वीकृति सहमति अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने से यह परिणाम के लिए परिवार भी उत्तरदायी होता है।

 घर में शिष्टाचार-7:-

 माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• पुत्र-पुत्रियों दोनों को माता के साथ रसोई और घर के कार्यों में हाथ बंटाना चाहिए। साथ ही, पिता के कार्यों में भी भागीदारी करनी चाहिए, ताकि उन्हें अधिक मेहनत न करनी पड़े।

• माता-पिता की बात को काटना नहीं चाहिए - अर्थात् उनसे बहस नहीं करनी चाहिए, अपितु उनकी बातों को ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए।

• घर में पधारे अतिथि से माता-पिता जब कोई संवाद कर रहे हों तो बीच बीच में नहीं बोलना चाहिए, और सबके सामने उनकी बात को काटना भी नहीं चाहिए। घर के मुखिया का हर तरह से सम्मान बनाए रखना भी शिष्टाचार है।

• माता-पिता से किसी भी बात अथवा कार्य के लिए कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए। यदि कोई गलती हो भी जाए तो सच बता देना चाहिए, ताकि एक झूठ को छिपाने के लिए अनेक झूठ न बोलने पड़ें।

 घर में शिष्टाचार-8:-

माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• माता-पिता की वस्तुओं को बिना बताए उठाना, उनका उपयोग करना शिष्टाचार नहीं, अशिष्टता है।

• किसी भी विषय पर माता-पिता से स्पष्ट बात करनी चाहिए। बातें बनाना, तथ्यों को छिपाना, गोल-मोल बात करना शिष्टता नहीं है। अतः जो भी बात हो वह स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि उसके समाधान आदि में कोई संशय की स्थिति न रहे।

• माता-पिता के रुपए-पैसे आदि को बिना पूछे नहीं उठाना चाहिए, अन्यथा यह आदत चोरी की ओर ले जाती है।

 घर में शिष्टाचार-9:-

 माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• घर में मेहमान आएँ तो माता-पिता से अधिक न बोलें और न ही बीच-बीच में बोलकर व्यवधान डालें। ऐसा करना अशिष्टता है।

• यदि माता-पिता किसी बात पर अथवा किसी गलती पर डाँटें, नाराज हों तो बच्चों को चाहिए कि वे उनके विरुद्ध कुछ न कहें, क्योंकि माता-पिता के विरुद्ध होना शिष्टाचार नहीं अपितु दुराचार है। अतः माता-पिता की बात को सदैव ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, क्योंकि कोई भी माता-पिता अपनी संतान का कभी बुरा नहीं चाहते। वे यदि नाराज भी होते हैं तो उनकी भलाई एवं गलतियों को सुधारने के लिए होते हैं।

 घर में शिष्टाचार-10:-

माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• माता-पिता से किसी वस्तु आदि को लेने के लिए अनुचित जिद नहीं करनी चाहिए। उनकी स्थिति परिस्थिति को देखकर ही किसी वस्तु की इच्छा प्रकट करनी चाहिए। यह कार्य उच्च शिष्टाचार की निशानी है।

• कोई भी कार्य माता-पिता से विचार-विमर्श करके ही करना चाहिए, क्योंकि वही उचित सलाह दे सकते हैं। यदि बिना पूछे कोई कार्य करेंगे तो हो सकता है कि आपको पछताना पड़े अथवा कार्य बिगड़ जाए। कार्य के दौरान भी माता-पिता से परामर्श लेते रहना चाहिए।

• वृद्ध माता-पिता की सेवा करना संतान का परम कर्तव्य है। सदैव वृद्ध माता-पिता की समुचित देखभाल करनी चाहिए। माता-पिता के ऋण को कोई सन्तान उतार नहीं सकती।

 घर में शिष्टाचार-11:-

 माता-पिता के प्रति शिष्टाचार-

• यदि माता-पिता अत्यधिक वृद्ध अथवा लाचार हैं, तब उनका विशेष ख्याल रखना भगवान् की सेवा के समान होता है। जीवन में मातृ-पितृ ऋण प्रथम व बड़ा ऋण होता है।

• घर से दूर रहकर कार्यरत बेटे-बेटियों का यह कर्तव्य है कि वे दूर रहने वाले माता-पिता का पूरा ख्याल रखें। नित्यप्रति उनसे बातचीत करना तथा समय-समय पर घर आते रहना चाहिए। 

• पुत्रियों और पुत्रों में कोई अंतर नहीं, अतः पुत्र हो अथवा पुत्री-दोनों को अपने माता- पिता का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए।

• यदि किन्हीं माता-पिता के पुत्र न हों, तब पुत्रियों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। उनका कर्तव्य है कि विवाहोपरांत भी अपने माता-पिता की समुचित देखभाल करें। उनसे समय-समय पर संवाद करते रहना चाहिए। 

इस तरह, संतान का माता-पिता के प्रति उचित शिष्टाचार उन्हें न केवल संस्कारित करता है, वरन् एक दैवीय प्रसन्नता और आत्मविश्वास भी प्रदान करता है। परिणामस्वरूप हम जीवन में सम्यक उन्नति करते हैं।

 

राष्ट्रीय व्यवहार-

1.राष्ट्रीय प्रतीकों का सम्मान यथा राष्ट्रध्वज तिरंगा, राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत और संविधान।

2.राष्ट्रीय पर्व जैसे स्वाधीनता दिवस और गणतंत्र दिवस आदि के कार्यक्रम में सहभागी होना।

3.सैनिकों का सम्मान देश का सम्मान है।

4.राष्ट्रीय संपत्ति की सुरक्षा करना।


 आर्थिक व्यवहार के सम्बन्ध में-

1.आर्थिक व्यवहार में मितव्ययिता और सादगी हो। 

2.आर्थिक व्यवहार मे पारदर्शिता हो। 

3.रिश्वत देना नहीं, और लेना भी नहीं। 

4.परायी वस्तु अथवा धन की ओर उपेक्षा की दृष्टी रहे। 

5.हिसाब किताब ठीक रखना। लिखकर रखना।

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