सरस्वती राजमणि :-
सरस्वती राजमणि आजाद हिंद फौज के लिए काम करने वाली सबसे कम उम्र की महिला गुप्तचर...
हम में से कितने लोगों ने सरस्वती राजमणि के बारे में सुना है? अधिकांश लोगों ने उनके बारे में कभी सुना भी नहीं है। जबकि वे आजाद हिंद फौज के लिए काम करने वाली सबसे कम उम्र की महिला गुप्तचर थीं।
सरस्वती राजमणि का जन्म रंगून में हुआ था। उनके पिता रंगून के सबसे संपन्न भारतीयों में से एक थे। वे त्रिची की एक सोने की खान के मालिक थे।
सरस्वती राजमणि के पिता भी अंग्रेजों के विरुद्ध भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय थे। बार-बार अंग्रेजों द्वारा की जाने वाली धरपकड़ से बचने के लिए वे रंगून चले गए और वहीं बस गए। वहाँ से भी वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के लिए निरंतर कार्य करते रहे।
सरस्वती राजमणि भी उनके पद चिह्नों पर चलकर देश को स्वतंत्र कराने में अपना योगदान देना चाहती थीं। उन्हें अपने परिवार से भी पूरा सहयोग मिला।
सरस्वती राजमणि का जन्म 1927 में हुआ था। बाल्यकाल से ही उन्होंने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विषय में सुना था। वास्तव में नेताजी ने ही उनका नाम सरस्वती रखा था। इसके पीछे भी एक रोचक कथा है:
बात 1942 की है, नेताजी आजाद हिंद फौज के लिए स्वयंसेवक और धन की व्यवस्था करने के सिलसिले में रंगून आए हुए थे। 15 वर्षीय राजमणि ने भी उनका भाषण सुना।
सुभाष चंद्र बोस ने अपने भाषण में बर्मा में रह रहे भारतीयों को अंग्रेजों के विरुद्ध शस्त्र उठाने के लिए कहा ताकि भारत से अंग्रेजों को खदेड़ा जा सके। सरस्वती राजमणि पर उनकी इस बात का इतना प्रभाव पड़ा कि वह अपने घर जाकर अपने सारे सोने, चाँदी और हीरे के गहने लाई और आजाद हिंद फौज को उसी समारोह में दान कर दिए। उनके पिता ने पहले ही आजाद हिंद फौज को बहुत दान किया हुआ था।
जब यह गहने दान करने वाली बात नेताजी के सामने आई तो उन्हें लगा कि सम्भवतः राजमणि ने अपने बाल सुलभ व्यवहार में यह दान किया है। *नेताजी स्वयं वह गहने लेकर सरस्वती राजमणि के घर पहुँचे और उन्हें वह गहने वापस लेने के लिए कहा। परंतु राजमणि ने स्पष्ट मना कर दिया। उनका कहना था कि वह सारे गहने उनके अपने थे, उनके परिवार के नहीं।*
उनके (राजमणि) के ऐसे दृढ़ निश्चय और प्रखर देशभक्ति को देखकर नेताजी ने उनका नाम 'सरस्वती' रख दिया। नेताजी ने कहा- "लक्ष्मी आती-जाती रहती है, परंतु सरस्वती नहीं..।" मुझे इस बेटी में सरस्वती का वास दिख रहा है। तब से ही राजमणि, सरस्वती राजमणि बन गई।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आजाद हिंद फौज को समाप्त घोषित कर दिया गया। नेताजी के निर्देश पर सरस्वती राजमणि अपने परिवार के साथ भारत वापस आ गईं। उनके परिवार ने अपना सारा धन- वैभव पहले ही भारत की स्वतंत्रता के लिए समर्पित कर दिया था। भारत लौटकर इस परिवार को एक बहुत ही सामान्य गरीब परिवार की भाँति रहना पड़ा। यहाँ तक कि उनके परिवार के विषय में किसी को कुछ पता तक नहीं था।
तत्पश्चात सन् 2005 में एक समाचार पत्र ने सरस्वती राजमणि के विषय में खबर छापी कि कैसे वह छोटे से एक कमरे के मकान में अपनी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के जरिए अत्यंत कठिनाई से जीवन यापन कर रही हैं।
● अपने इस सारे संघर्ष के उपरांत भी वे इस समय समाज से पुराने कपड़े एकत्रित करके उन्हें सिलकर पहनने योग्य बनाकर फिर उनको जरूरतमंद गरीब लोगों में बाँट देती थीं।
● उन्होंने अपनी स्वतंत्रता सेनानी पेंशन में से वर्ष 2006 के सुनामी आपदा पीड़ितों के लिए भी योगदान दिया था।
● तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री जयललिता ने उन्हें एक घर और पांच लाख रुपए की राशि देकर सम्मानित किया था।
13 जनवरी, 2018 को हृदयाघात से सरस्वती राजमणि का स्वर्गवास हो गया..। जीवन में अनामिकता रखी, और जीवन के बाद भी अज्ञात, अनामिक बनी रहीं- इतिहास भी मौन रहा...
नेताजी के नेतृत्व में गुमनाम रहकर देश की स्वतन्त्रता के लिए 'राष्ट्राय स्वाहा, इदम् न ममः' के समर्पित भाव से काम करने वाली ऐसी वीरांगना सरस्वती राजमणि को हमारा कोटि कोटि नमन्।
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